अभी कुछ दिनो पहले मई एक अख़बार में एक आर्टिकल पढ़ रहा था। आर्टिकल का विषय क्या था, ये तो याद नहीं पर उसमें लिखी एक लाइन ज़ेहन में बैठ गई। Escapist- जो लोग अपना वर्तमान कम छोड़ के दूसरे काम/ व्यवसाय के बारे में सोचते है कि वो उस काम या व्यवसाय को ज़्यादा अच्छे और बेहतर तरीक़े से कर सकते है। फिर जब वो अपना हाथ उस नए काम में लगाते है,उन्हें दूसरा नया काम सुझता है। उन्हें अब इस नए काम/ व्यवसाय में भी आनंद नहीं आता है। उन्हें फिर लगता है कि इस काम को छोड़कर वो कोई और दूसरा आकर्षक कार्य आसानी से कर सकते है।
इन लाइनों को पढ़ने के बाद, मुझे लगा कि कही ना कही मेरा भी तो यही हाल है। मुझे भी तो कोई भी वर्तमान काम या प्रोफ़ेसन में ज़्यादा आनंद नहीं आता। मुझे भी तो यही लगता है की ये दूसरा वाला काम ज़्यादा अच्छे तरीक़े से किया जा सकता है। फिर जब नया काम शुरू करता हूँ तो कुछ दिनो के आनंद के पश्चात फिर से बोरियत लगने लगती है। फिर से यही ख़्याल आने लगता है कि कोई दूसरा नया काम जो कि कूल लगता है उसे मैं अच्छे तरीक़े से कर सकता हूँ।
अगर मैं अपनी ज़िंदगी में पीछे मुड़ कर देखता हूँ, तो पाता हूँ कि ऐसे मैंने बहुत सारे काम प्रारम्भ किए जो नए थे, कूल थे। उनमें कुछ हद तक सफलता भी पाई, परंतु कुछ दिनो के बाद वही बोरियत और फिर से कोई नया कार्य। उदाहरण के लिए मैंने इंटर्मीडीयट के बाद बहुत ही चाव से होटेल मैनज्मेंट में एडमिसन लिया। क्यूँकि उसके बारे में मैंने किसी के द्वारा सुन रखा था कि बहुत ही अच्छा है ये। जिसने भी मुझे उसके बारे में बताया सिर्फ़ अच्छाई बताई, बुराई नहीं। या फिर उत्साह इतना था कि मैंने सिर्फ़ अच्छाई सुनी बुराई सुन ही नहीं पाया। ख़ैर होटेल मैनज्मेंट में अड्मिशन के कुछ महीनो में ही मुझे लगने लगा कि ये वो नहीं नहीं जिसे मैं सोच कर आया था। मैं इससे ज़्यादा अच्छा किसी और कोर्स में कर सकता था। Escapism का पहला प्रभाव।
होटेल मैनज्मेंट के बाद जॉब किया, उससे भी बोर हो गए। कि इसे छोड़ कर MBA किया जाएगा, दूसरे सेक्टर में अच्छी नौकरी करेंगे। Escapism का दूसरा प्रभाव। फिर जॉब छोड़ा MBA के मक़सद से। कुछ दिनो में लगने लगा कि MBA भी पक्का/आसान नहीं है तो शुरू हुई किसी और नौकरी की तैयारी। कभी ये ऐक्टिविटी की तो कुछ दिनो बाद दूसरी। कभी adventure तो कभी संगीत। कभी UPSC तो कभी कुछ और। फ़िलहाल अभी तो जहां भी वहाँ पर स्थायी हूँ/ टिक गया हूँ। परंतु रह रह के यही लगता है, ये नहीं कुछ और।
मैं अब भी पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो ये लगता है कि कमियाँ या अच्छाइयाँ होने के बावजूद भी अगर मई किसी भी एक सेक्टर में लगा रहता तो वह भी अच्छा ही करता। इतना सब इधर उधर भाग दौड़ करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। परंतु समस्या यही है कि जब भी हम कोई वर्तमान काम करते है तो हमें अच्छाई और बुराई दोनो पता होता है। जब की नए काम की सिर्फ़ और सिर्फ़ अच्छाई पता होती है। उसकी बुराइयों पर या तो हम ध्यान नहीं देते है या फिर फिर जान बुझ कर उन्हें नकार देते है। फिर जब नए काम शुरू करते है तो यही बुराइयाँ और ख़राब लगने लगती है और ध्यान फिर भटकने लगता है नए काम की तरफ़। हालाँकि अब मुझे प्रतीत होता है कि बुराइयाँ और अच्छाइयाँ हर जगह है। हम जहाँ भी है और जिस काम में भी है अगर उस पर अपना 100% दे तो बाक़ी सब से बेहतर कर सकते है। क्यूँकि सफल और असफल लोगों का उदाहरण सभी सेक्टर्स में है। मेरे हिसाब से अगर लक फ़ैक्टर को छोड़ दे सफलता और असफलता के बीच में अंतर escapism से बचाव और 100% फ़ोकस ही बनाता है।
मैं jack of all trades नहीं बन सकता। मुझे या आपको ये फ़ैक्ट स्वीकारना पड़ेगा। अब सोचता यही हूँ की जो भी मेरे पास है मैं उसी पर फ़ोकस करु और महारत हासिल करु। बाक़ी सब ऊपर वाले के हाथ में जैसे की गीता में कहा गया है। कर्मणये वधिकारस्ते मा फलेसू कदाचन।
ब्लॉग खतम करने से पहले बताता चलूँ कि Escapism पर ब्लॉग लिखने से पहले मैंने थोड़ा बहुत इंटरनेट पर रीसर्च कर किया था जो आपके साथ साझा करना चाहूँगा। Escapism क्या है- इस वेब्सायट https://www.vocabulary.com/dictionary/escapist के अनुसार – Escapist या पलायनवादी वो है जो अपनी वास्तविक जीवन में नहीं बल्कि सपनो में रहता है। या फिर dayreaming ( दिवास्वप्न) में व्यस्त रहता है।Escapist या पलायनवादी जीवन के यथार्थ से बचने के लिए विविध चीज़ों जैसे कि फ़िल्मों, टेलिविज़न, किताब, vediogame, स्पोर्ट्स, अल्कोहल या फिर अन्य व्यवशाय में डूब जाते है।
हालाँकि ऊपर के डेफ़िनिशन के अनुसार कुछ लक्षण तो है मुझमें में भी इसके, परंतु सारे नहीं है। मतलब ये है की सुधार की गुंजाइस है। दीवास्वप्न तथा आपधापि जीवन से दूर रहना मुझमें लक्षण हो सकते है। परंतु बाक़ी सब नहीं।
हालाँकि उसी रीसर्च में मैंने आगे पाया की Escapism या पलायनवाद ज़रूरी रूप से बुरी चीज़ नहीं है। छोटे वक्त के लिए ये उचित है जहां हम अपने दीमाग को रोज़मर्रा के तनाव और भाग दौर से कुछ समय के लिए बंद कर देते है। जिससे हमें कुछ ज़रूरी आराम और आनंद की प्राप्ति होती है। आपको पहचानना होगा कि किन परिस्थितियों में आपको पलायन या Escape करना है।अगर आप जीवन के यथार्थ से भाग रहे है तो यह नुक़सानदायक हो सकता है। https://welldoing.org/article/why-escapism-can-be-harmful के अनुसार लम्बे वक्त के लिए यह काफ़ी नुक़सान दायक हो सकता है। जो हमें हमारे वर्तमान काम को करने से रोक देगा। इस जगह से उस जगह पर उछलता रहेगा।
हम escapism को इसलिए अपनाते है कि हमें वर्तमान जीवन में दर लगता है, हमें शर्म महसूस होती है, हमें महसूस होता है कि हम असफल हो रहे है।अब Escapism या पलायनवाद से कैसे बाहर निकला जा सकता है/ बचा जा सकता है-
https://welldoing.org/article/why-escapism-can-be-harmful के अनुसार –
- पहले यह सुनिस्चित करिए कि आप किस चीज़ से पलायन कर रहे है या किन परिस्थितियों में पलायन करते है।
- जीवन के यथार्थ/असलियत को स्वीकारिए।
- आप जिस भी परिस्थिति में हो पहले उसे स्वीकार करे।
- क्या हमारा कोई मूड (MOOD) है जो हमें पलायन करने हेतु प्रेरित करता है।
- जब हम अपनी काल्पनिक दुनिया से वापस आते है तो कैसा महसूस करते है, उसे जानिए।
- खुद को स्वीकारना, जीवन तथा दूसरों के प्रति कृतज्ञता का भाव रखना, आपकी मदद कर सकता है।
- सोशल मीडिया से दूरी बनाए रखिए।
- ध्यान, योग और लेखन इस कार्य में आपकी मदद कर सकते है।
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